Raigarh News : आधुनिकता की दौड़ में संस्कृति से अलग होती पीढ़ी और विकास के नाम पर प्रकृति से लगातार हो रहे छेड़छाड़ का दुष्प्रभाव समाज पर बढ़ता जा रहा है। आधुनिकता की चकाचौंध में हम अपनी संस्कृति, सभ्यता व संस्कारों को भूलते जा रहे है। जबकि शिष्टाचार व नैतिकता हमारे जीवन की अहम कड़ी है। इन्हीं सभ्य संस्कृति और पूर्ण प्रकृतिवादी विचार को जगाने के लिए छत्तीसगढ़- उड़ीसा बॉर्डर पर स्थित हमीरपुर-टपरिया गांव में विश्व शांति ब्रह्मयज्ञ महिमा बाल्यलीला का 18 वां वर्ष आयोजित होने जा रहा है। जिसमें ब्रह्मवधूत श्री बीरेंद्र कुमार बाबा व उनके शिष्यों के द्वारा समाज को प्रकृतिवादी विचारधारा अपनाने और चोरी, हत्या, मिथ्या, मांसाहारी, नशे जैसी कुरीतियों से दूर होने का संदेश प्रवचन के माध्यम से दिया जाएगा।

तीन दिनों तक चलेगा कार्यक्रम
माघ कृष्ण पक्ष अष्टमी ( 3 फरवरी ) को प्रातः 11:00 बजे से नवनिर्मित धुनी मंदिर में कुंभभराई किया जाएगा। मांग कृष्ण पक्ष नवमी (4 फरवरी) को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में दर्शन, आठ भजन, घृताहुति, बालक भजन, सत्संग व प्रवचन होगा। माघ कृष्ण पक्ष दशमी( 5 फरवरी) को ब्रह्म मुहूर्त में यज्ञ, सत्संग,प्रवचन, यज्ञ पूर्णाहुति एवं सामूहिक प्रसाद वितरण किया जाएगा।


क्या है कुंभभराई रस्म
छत्तीसगढ़ और उड़ीसा बॉर्डर पर पढ़ने वाले हमीरपुर गांव में एक धूनी मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है। जिसमें 3 फरवरी को कुंभ भराई किया जाएगा। ग्रामीणों की मानें तो, कुंभ भराई रस्म को उड़ीसा के लोग (रत्नमुद) कहते हैं। जिसमें लोग अपनी इच्छा अनुसार धन, जेवरात, अष्टधातु, अनाज व अन्य सामग्रियां मंदिर के ऊपरी हिस्से पर दान स्वरूप रखते हैं। इसके बाद मंदिर के उस ऊपरी हिस्से में रखे गए विभिन्न सामग्रियों को ढकने के लिए ऊपर से सीमेंट का पलस्तर किया जाता है।
क्या है धुनी मंदिर का अर्थ
ग्रामीणों ने बताया कि मंदिर में किसी भगवान की कोई मूर्ति स्थापित नहीं की जाएगी,न हीं किसी प्रकार का छायाचित्र बनाया जाएगा। मंदिर के अंदर केवल अखंड दीप प्रज्वलित की जाएगी। जहां आधुनिक युग में निर्मित अगरबत्ती का भी इस्तेमाल नहीं होगा।
शामिल होते हैं लाखों लोग
छत्तीसगढ़ उड़ीसा बॉर्डर पर आयोजित होने वाला विश्व शांति ब्रह्म यज्ञ महिमा बाल्यलीला का यह 18 वां वर्ष है, कार्यक्रम का आयोजन जिले के तमनार क्षेत्र में आने वाले गांव के लोगों की सहयोग से होता है। लोगों की भीड़ से कार्यक्रम परिसर मेले के रूप में तब्दील हो जाता है। विगत वर्षों की भांति इस बार भी भजन सत्संग सुनने वह मेला का लुफ्त उठाने के लिए आसपास के लाखों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।


ब्रह्मवधूत बाबाओ की विशेषता
कार्यक्रम के आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि ब्रह्मवधूत श्री बीरेंद्र कुमार बाबा और उनके शिष्य विशेष नियमों का पालन करते हैं। उन्होंने बताया कि सभी बाबा एक ही जगह पर 24 घंटे से अधिक का समय व्यतीत नहीं करते हैं। कड़ाके की ठंडी में भी सभी बाबा भोर के समय ही स्नान करते हैं। सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद भोजन ग्रहण नहीं करते हैं। सभी बाबा प्रकृति वादी होते हैं। आधुनिक युग में विज्ञान द्वारा निर्मित सामग्रियों का इस्तेमाल नहीं करते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि बाबा लोग भरी बरसात में भी छतरी का उपयोग न करके ताल पेड़ के पत्ती का उपयोग छतरी के रूप में करते हैं, वही आवागमन में गाड़ियों का उपयोग न करके पैदल ही मंजिल तक पहुंचते हैं। बाबाओं का जीवन यापन छत के नीचे न होकर खुली आसमान के नीचे होता है। भोजन भी पेड़ के नीचे छांव में बैठकर करते हैं। ब्रह्मवधूत बाबाओं का समाज को यही संदेश है कि आधुनिकता का परित्याग कर सभ्य संस्कृति और प्रकृति वादी विचारधारा को अपनाया जाए।
आयोजन में इनकी रहती है अहम भूमिका
कार्यक्रम के आयोजन में आयोजक समिति के अध्यक्ष के रूप में सुरेंद्र सिदार,महिला विंग अध्यक्ष जानकी राठिया, सक्रिय सदस्य विजय शंकर पटनायक, आशीष मिश्रा ( उप सरपंच), बाबूलाल गुप्ता, देवनारायण साहू, समिति सचिव सत्यनारायण गुप्ता, भागीरथी गुप्ता, सुरेश भोय, नरसिंह प्रधान वह समस्त ग्राम वासियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
आधुनिकता की दौड़ में संस्कृति खोती पीढ़ी
कहा जाता है कि कोई भी पेड़ तब तक ही जीवित रह पाता है, जब तक वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है। समाज में व्यक्ति की वे जड़ें संस्कृति है, जिससे जुड़ा रहना व्यक्ति के लिए आवश्यक होता है। संस्कृति से कटा हुआ व्यक्ति कटी डोर की पतंग की भांति होता है, जो उड़ तो रहा होता है लेकिन मंजिल व रास्ता तय नहीं होता, न ही पता होता है कि वह कहां जाएगा।
वर्तमान परिदृश्य में समाज को देखें तो पता चलता है कि युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति को दिन-प्रतिदिन पीछे छोड़कर आगे आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल होती जा रही है। संस्कृति-संस्कार ऐसे अभिन्न अंग हैं जिनसे समाज तय होता है। कहा जाता है कि जिस प्रकार की संस्कृति व संस्कार किसी समाज में प्रचलित होंगे, उसी स्तर का समाज सभ्य माना जाता है। हमारे देश-प्रदेश की संस्कृति व संस्कार वैश्विक मंच पर आदर्श स्थान पर रहे हैं। भारतीय जीवनशैली को विश्व में सबसे श्रेष्ठ व सभ्य माना जाता रहा है। लेकिन समय के चक्र व पाश्चात्य प्रभाव ने कई संस्कृतियों के संस्कारों को उधेड़ कर रख दिया।
आज अधिकांश लोग संस्कृति व संस्कारों के साथ जीने को पिछड़ापन मानते हैं, लेकिन पिछड़े हुए तो उन्हें कहा जा सकता है जो अपनी संस्कृति व संस्कारों से छिटक कर अपना पाश्चात्यकरण कर चुके हैं। भारत की संस्कृति व सभ्यता का तर्क व वैज्ञानिक आधार रहा है, जिसने पूरे विश्व को जीवन मार्ग पर चलना सिखाया, तभी भारत को ‘विश्व गुरु’ जैसी उपमाओं से अलंकृत किया जाता रहा है। लेकिन वर्तमान में समाज का अधिकांश वर्ग आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी संस्कृति व संस्कारों को भुला चुका है। माता-पिता को सम्मान देने की बजाय उन्हें वृद्धाश्रमों में जीवन काटने के लिए या यूं कहें कि मौत के इंतजार के लिए छोड़ दिया जाता है। जिन माता-पिता ने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपना जीवन कष्टों में काटा, आज उन्हें घरों से ही निकाला जा रहा है।
जहां विवाह-शादियों में बेटियों को डोलियों में विदा किया जाता था, आज स्टेज पर ही सारी औपचारिकताएं निभा दी जाती हैं। युवा खेलों को छोड़कर नशे को ही खेल समझ बैठे हैं। अपनी ताकत गलत कार्यों में लगाकर युवा पीढ़ी संस्कृति की जड़ों से कट चुकी है। पहले गुरु-शिष्य के संबंधों की महिमा लोगों की जुबां पर होती थी, आज युवा गुरुओं को सम्मान देने की बजाय कई बार तो सामने आने पर रास्ता बदल लिया करते हैं।










